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किडनी की बीमारियां बनीं पेट्स की मौत का दूसरा बड़ा कारण, समय पर जांच से बचाव संभव
17वीं एफएसएपीएआई महाकुंभ के दूसरे दिन पेट्स में किडनी की बीमारियों और मोतियाबिंद पर हुई चर्चा
इंदौर। पालतू जानवरों में किडनी से जुड़ी बीमारियां तेजी से सामने आ रही हैं और यह उनकी मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण बन चुकी हैं। समय पर पहचान और नियमित जांच से इस गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है, लेकिन जागरूकता की कमी अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। प्रदेश में पहली बार हो रही 17वीं एफएसएपीएआई इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के दौरान ब्राजील से आए नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. मार्सियो बर्नस्टीन ने बताया कि पेट्स में किडनी खराब होने के शुरुआती संकेत स्पष्ट होते हैं, लेकिन अक्सर इन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसे मामलों में जानवर खाना छोड़ देते हैं, बार-बार यूरिन करते हैं, उल्टियां होने लगती हैं और उनका वजन तेजी से घटता है। उन्होंने बताया कि केवल एक साधारण यूरिन टेस्ट से भी बीमारी की पहचान की जा सकती है।
यह तीन दिनी कांफ्रेंस ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में फेडरेशन ऑफ स्मॉल एनिमल प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FSAPAI) और यूनाइटेड स्मॉल एनिमल प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के संयुक्त तत्वावधान में हो रही है। ऑर्गेनाइजिंग कमिटी के प्रेसिडेंट डॉ एच.एल साहू ने बताया कि इस तरह के आयोजन से पशु चिकित्सा के क्षेत्र में नई तकनीकों और विशेषज्ञता का आदान-प्रदान संभव होता है। वहीं, ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी डॉ नरेंद्र चौहान ने कहा कि पेट्स के लिए स्पेशलाइज्ड ट्रीटमेंट की जरूरत लगातार बढ़ रही है।
साल में एक बार ब्लड और यूरिन टेस्ट जरुरी
विशेषज्ञों के अनुसार किडनी खराब होने के पीछे इंफेक्शन समेत कई कारण जिम्मेदार होते हैं। इसलिए केवल इलाज ही नहीं, बल्कि मूल कारण की पहचान करना भी जरूरी होता है। समय रहते उपचार शुरू कर दिया जाए तो किडनी फेलियर जैसी गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है। हालांकि, किडनी फेल होने के बाद डायलिसिस ही एकमात्र विकल्प रह जाता है, क्योंकि पेट्स में विभिन्न ब्लड ग्रुप होने के कारण किडनी ट्रांसप्लांट करना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं होता। डॉक्टरों ने सभी पेट पेरेंट्स को सलाह दी है कि वे साल में कम से कम एक बार अपने पालतू जानवरों का ब्लड और यूरिन टेस्ट जरूर कराएं। इससे न केवल मौजूदा बीमारियों का पता चलता है, बल्कि भविष्य में होने वाली संभावित समस्याओं का भी संकेत मिल सकता है।
वेटेनरी ऑप्थेल्मोलॉजी में बढ़ रही चुनौतियां
जयपुर से आए ऑप्थेल्मोलॉजिस्ट डॉ सुरेश कुमार झिरवाल ने बताया कि वेटेनरी क्षेत्र में आंखों से जुड़ी बीमारियों का इलाज अब भी शुरुआती स्तर पर है। खासकर मोतियाबिंद की सर्जरी काफी जटिल होती है, जिसके लिए विशेष प्रशिक्षण और सॉफ्ट हैंडलिंग जरूरी होती है। उन्होंने कहा कि भारत में अभी वेटेनरी पढ़ाई के दौरान ऑप्थेल्मोलॉजी की अलग ब्रांच नहीं है, जबकि विदेशों में सुपर स्पेशलाइजेशन का चलन बढ़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के प्रति जागरूकता कम है, जहां गाय, भैंस और बकरी जैसे पशु अधिक होते हैं। वहीं शहरी इलाकों में डॉग्स और कैट्स को परिवार के सदस्य की तरह रखा जाता है, जिससे उनके इलाज और सर्जरी पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
आंखों के लक्षणों से पहचानें मोतियाबिंद
उन्होंने बताया कि पेट्स की आंखों के रंग में बदलाव मोतियाबिंद का संकेत हो सकता है। आंखों का सफेद होना और रात में आंखों की चमक कम होना इसके प्रमुख लक्षण हैं। ऐसे संकेत दिखते ही तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए, ताकि समय रहते इलाज संभव हो सके।


